कांगो के जंगलों में मिले नारंगी होंठ वाले अनोखे बंदर की वो अनसुनी कहानी जो वैज्ञानिक भी छिपा रहे थे

कांगो के जंगलों में मिले नारंगी होंठ वाले अनोखे बंदर की वो अनसुनी कहानी जो वैज्ञानिक भी छिपा रहे थे

साल 2008 की बात है। कांगो के घने, अंधेरे और दलदली जंगलों के बीच एक ऐसी तस्वीर ली गई जो बेहद धुंधली थी। इतनी धुंधली कि कोई भी उसे देखकर कह देता कि यह कैमरे की खराबी है या फिर कोई आम बंदर परछाई में अजीब दिख रहा है। पर वैज्ञानिकों की एक टीम अड़ गई। उन्हें लगा कि इस धुंधली तस्वीर के पीछे कोई गहरा राज छुपा है। पूरे 15 साल से ज्यादा का समय लग गया इस राज को खोलने में। 16 जुलाई 2026 को आखिरकार दुनिया के सामने आधिकारिक घोषणा हुई कि कांगो के वर्षावनों में बंदर की एक बिल्कुल नई प्रजाति मौजूद है। इसके होंठ चमकीले नारंगी हैं और शरीर कोयले जैसा काला है।

वैज्ञानिकों ने इसे कोलोबस कांगोएन्सिस (Colobus congoensis) नाम दिया है। लेकिन स्थानीय लोग इसे सदियों से जानते थे। वे इसे 'लिक्वेली' (Likweli) बुलाते हैं। कमाल की बात यह है कि अफ्रीका के विशाल जंगलों में पिछले 75 सालों में खोजी गई यह सिर्फ पांचवीं नई बंदर प्रजाति है। यह कोई छोटा-मोटा अचीवमेंट नहीं है। इस खोज ने साबित कर दिया है कि हमारी धरती के कुछ कोने आज भी इंसानी पहुंच और हमारी समझ से कितने दूर हैं।


कांगो के घने जंगलों में बंदर की नई प्रजाति की खोज का असली सच

इस खोज के पीछे की कहानी किसी थ्रिलर फिल्म जैसी है। वैज्ञानिक जूनियर डी. अंबोको और उनकी टीम कई सालों तक इन जंगलों की खाक छानती रही। लोमामी नेशनल पार्क का वह हिस्सा जहां इंसानों का कदम रखना भी दूभर है, वहां इस बंदर का ठिकाना है। यह पार्क डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के केंद्र में स्थित है। यह इलाका लोमामी और लीलो नदियों के बीच घिरा हुआ है।

इस बंदर को खोजने में इतना लंबा वक्त क्यों लगा? इसका सीधा सा जवाब है इसका स्वभाव। लिक्वेली बेहद शांत और रहस्यमयी जीव है। यह घने जंगलों के सबसे ऊपरी हिस्से में, यानी ऊंचे पेड़ों की टहनियों पर रहता है। जब तक आप इसकी तलाश में अपनी गर्दन न दुखा लें, तब तक यह आपको दिखने वाला नहीं। स्थानीय मितुकु समुदाय के लोग इसे अपनी भाषा में 'कसाबा न्कोनी' भी कहते हैं, जिसका सीधा मतलब होता है "टहनियों को हिलाने वाला"।

वैज्ञानिकों ने साल 2018 से 2022 के बीच इस जीव को करीब 114 बार करीब से देखा और इसकी तस्वीरें लीं। इसके बाद इनके डीएनए सैंपल्स जुटाए गए और उनकी तुलना पहले से मौजूद ब्लैक कोलोबस प्रजातियों से की गई। नतीजा चौंकाने वाला था। यह बंदर अपने करीबी रिश्तेदारों से लगभग 50 लाख साल पहले ही अलग हो चुका था। यानी यह कोई हालिया बदलाव नहीं है, बल्कि लाखों सालों की लंबी और शांत विकासवादी यात्रा का परिणाम है।


कैसा दिखता है यह अनोखा लिक्वेली बंदर

पहली नजर में आप इसे देखेंगे तो इसकी शक्ल आपका ध्यान खींच लेगी। इसका पूरा शरीर काले घने बालों से ढका है। लेकिन इसके चेहरे पर कुदरत ने गजब की कलाकारी की है।

  • चमकीले नारंगी होंठ: इसके होंठों के चारों तरफ हल्के नारंगी और गुलाबी रंग का घेरा होता है, जो इसे सबसे अलग बनाता है। ऐसा लगता है जैसे इसने कोई चमकीली लिपस्टिक लगा रखी हो।
  • धूसर गाल: इसके गालों की हड्डियां बिना बालों वाली और धूसर (ग्रे) रंग की होती हैं।
  • पीछे सफेद पैच: इसके निचले हिस्से और गुदा के आसपास सफेद रंग का एक साफ दिखने वाला बालों का पैच होता है।
  • अजीब आवाज: यह बंदर दूसरे बंदरों की तरह चीखता नहीं है। इसके बात करने का तरीका एक भारी दहाड़ या गुर्राहट जैसा होता है। शोधकर्ताओं ने जंगलों में कैमरों की मदद से इसकी ऐसी छह भारी दहाड़ें रिकॉर्ड की हैं।

यह प्रजाति बहुत बड़े समूहों में नहीं रहती। अमूमन ये 1 से लेकर 20 बंदरों के छोटे-छोटे कुनबों में रहते हैं। इनका मुख्य भोजन पेड़ों की पत्तियां, नए कोमल पत्ते और जंगली फल हैं।


क्या स्थानीय लोगों को पहले से पता था इसके बारे में

अक्सर जब कोई नई प्रजाति खोजी जाती है, तो साइंस कम्युनिटी इसका पूरा क्रेडिट खुद ले लेती है। मगर इस मामले में वैज्ञानिकों ने बड़ी ईमानदारी से एक बात स्वीकार की है। वे मानते हैं कि स्थानीय लोग इस बंदर के बारे में सदियों से जानते थे। हालांकि, उनकी यह जानकारी भी बहुत सीमित थी।

रिसर्च टीम ने लोमामी पार्क के आसपास के करीब 52 गांवों में सर्वे किया। आपको जानकर हैरानी होगी कि इनमें से केवल 8 गांवों के लोगों को ही इस बंदर के बारे में सटीक जानकारी थी। वे इसका हुलिया और इसकी आवाज को पहचानते थे। बाकी गांवों के लोगों के लिए यह पूरी तरह अनजान था। इससे एक बात साफ होती है कि लिक्वेली का दायरा बेहद सीमित है। यह हर जगह नहीं मिलता।


अस्तित्व में आते ही खतरे की घंटी

यह बेहद दुखद है कि जिस प्रजाति को हमने अभी-अभी ठीक से पहचाना है, वह पहले से ही खत्म होने की कगार पर खड़ी है। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट जो 'PLOS ONE' जर्नल में छपी है, उसमें इसे तुरंत आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में 'लुप्तप्राय' (Endangered) श्रेणी में डालने की मांग की गई है।

इसके पीछे कुछ बहुत ही मजबूत और डराने वाले कारण हैं।

सबसे पहली बात, इसका रहने का इलाका बहुत छोटा है। यह बंदर केवल 1,700 वर्ग किलोमीटर के एक बेहद सीमित दायरे में सिमट कर रह गया है। इतने छोटे से क्षेत्र में अगर कोई प्राकृतिक आपदा आती है या इंसानी दखल बढ़ता है, तो पूरी की पूरी प्रजाति एक झटके में साफ हो सकती है।

कांगो बेसिन वैसे भी अवैध शिकार, पेड़ों की कटाई और माइनिंग के लिए बदनाम रहा है। जंगलों के कटने से लिक्वेली के रहने की जगह लगातार छोटी होती जा रही है। जब तक हम इन घने जंगलों को बचाने के लिए कड़े कदम नहीं उठाएंगे, तब तक लिक्वेली जैसे न जाने कितने जीव बिना दुनिया के सामने आए ही हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगे।

अब अगला कदम केवल इस बंदर पर रिसर्च करना नहीं है। स्थानीय समुदायों को साथ लेकर इस 1,700 वर्ग किलोमीटर के नाजुक इलाके को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि जैव विविधता का बचना सिर्फ इन जानवरों के लिए नहीं, बल्कि खुद इंसानों के जिंदा रहने के लिए भी उतना ही जरूरी है।

EH

Ella Hughes

A dedicated content strategist and editor, Ella Hughes brings clarity and depth to complex topics. Committed to informing readers with accuracy and insight.